LIVE UPDATE

पेंड्रा में हाईकोर्ट के स्टे आदेश के बावजूद जारी नालंदा परिसर निर्माण: क्या CMO खुद को कानून से ऊपर मानते हैं? नागरिकों और शिक्षा क्षेत्र में बढ़ता आक्रोश

हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना या प्रशासनिक मनमानी? पेंड्रा में नालंदा परिसर निर्माण बना बड़ा विवाद

Gaurela pendra marwahi –

पेंड्रा, छत्तीसगढ़।गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के पेंड्रा नगर में नालंदा परिसर निर्माण को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और कानून के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला अब सिर्फ भूमि आवंटन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे-सीधे हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना (Contempt of Court) तक पहुंच गया है।

ये खबर भी पढ़ें…
बिलासपुर निवासी रितेश पर GPM में 4.58 लाख की कथित ठगी का आरोप! भरोसे में लेकर महिला से लिए लाखों रुपये, अब लौटाने से इनकार; गौरेला थाने पहुंची पीड़िता
बिलासपुर निवासी रितेश पर GPM में 4.58 लाख की कथित ठगी का आरोप! भरोसे में लेकर महिला से लिए लाखों रुपये, अब लौटाने से इनकार; गौरेला थाने पहुंची पीड़िता
November 1, 2026
आपसी जान-पहचान और भरोसे की आड़ में 4.58 लाख की कथित ठगी! जरूरत बताकर लिए पैसे, अब लौटाने से इनकार;...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश और जमीनी हकीकत

दिनांक 18 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने रिट याचिका क्रमांक 1167/2026 में सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया था कि खसरा नंबर 2370/1 पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य अगली सुनवाई तक नहीं किया जाएगा। यह आदेश मामले की संवेदनशीलता और भूमि विवाद को देखते हुए दिया गया था।

ये खबर भी पढ़ें…
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

किन्तु जमीनी स्तर पर जो स्थिति सामने आ रही है, वह न्यायालय के आदेश के बिल्कुल विपरीत है। स्थानीय लोगों और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार, स्टे आदेश के बाद भी निर्माण कार्य लगातार जारी है। मशीनें चल रही हैं, मजदूर काम कर रहे हैं और निर्माण गतिविधियां बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ रही हैं।

ये खबर भी पढ़ें…
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही- सुशासन की सरकार में अवैध उगाही का खेल! रुमगा में हर ट्रैक्टर से ₹200 वसूली का आरोप, आशीष पड़वार का नाम आया सामने; आखिर किसके संरक्षण में चल रहा वसूली का कारोबार?
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही- सुशासन की सरकार में अवैध उगाही का खेल! रुमगा में हर ट्रैक्टर से ₹200 वसूली का आरोप, आशीष पड़वार का नाम आया सामने; आखिर किसके संरक्षण में चल रहा वसूली का कारोबार?
November 3, 2026
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। प्रदेश में सुशासन और पारदर्शी व्यवस्था के दावों के बीच गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के रुमगा क्षेत्र से कथित अवैध वसूली...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

यह स्थिति सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना को दर्शाती है, जो न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है।

भूमि आवंटन में बड़ा खेल — एक जगह मांग, दूसरी जगह निर्माण

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू भूमि आवंटन को लेकर सामने आया है। दस्तावेजों के अनुसार, नालंदा परिसर निर्माण के लिए खसरा नंबर 2379/1 से लगभग एक एकड़ भूमि की मांग की गई है। यह प्रस्ताव शासन स्तर पर भेजा गया और उसी के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि खसरा नंबर 2379/1 में वर्तमान में हाई स्कूल का आम का बगीचा ही शेष है। इस भूमि पर निर्माण करना न केवल पर्यावरण के दृष्टिकोण से अनुचित है, बल्कि इससे स्कूल परिसर की संरचना और छात्रों के हितों को भी गंभीर नुकसान पहुंचेगा।

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जहां एक ओर भूमि की मांग 2379/1 से की जा रही है, वहीं दूसरी ओर निर्माण कार्य खसरा नंबर 2370/1 में किया जा रहा है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि कहीं न कहीं जानबूझकर तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा गया है और प्रशासन को भ्रामक जानकारी दी गई है।

स्कूल की जमीन और आम का बगीचा संकट में

खसरा नंबर 2379/1 की भूमि हाई स्कूल के नाम दर्ज है और यह शिक्षा विभाग की संपत्ति मानी जाती है। इस भूमि का एक बड़ा हिस्सा पहले ही सर्व समाज मांगलिक भवन के लिए आवंटित किया जा चुका है, जिससे उपलब्ध भूमि और सीमित हो गई है।

अब जो भूमि शेष बची है, उसमें आम का पुराना बगीचा है, जो न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि छात्रों के लिए भी एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में कार्य करता है। यदि इस भूमि पर निर्माण किया जाता है, तो पूरे बगीचे को काटना पड़ेगा, जिससे पर्यावरण को सीधा नुकसान होगा।

स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों का कहना है कि यह कदम स्कूल के भविष्य के साथ खिलवाड़ है और बच्चों के हितों की पूरी तरह अनदेखी की जा रही है।

करोड़ों की परियोजना पर उठते सवाल

नालंदा परिसर निर्माण के लिए लगभग 4.29 करोड़ रुपये की लागत निर्धारित की गई है। इस प्रकार की परियोजनाओं के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश होते हैं, जिनमें कम से कम एक एकड़ भूमि और शांत (Silent) क्षेत्र की अनिवार्यता शामिल है। लेकिन वर्तमान स्थल इन मानकों को पूरा नहीं करता। न तो पर्याप्त भूमि उपलब्ध है और न ही यह क्षेत्र पूरी तरह से शांत वातावरण वाला है। इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू कर देना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

क्या नियमों को नजरअंदाज कर परियोजना को जल्दबाजी में आगे बढ़ाया जा रहा है? या फिर इसके पीछे कोई और उद्देश्य छिपा है?

गलत जानकारी देकर पैदा किया गया विवाद?

आरोप यह भी है कि मुख्य नगर पालिका अधिकारी द्वारा शासन को गलत और भ्रामक जानकारी दी गई है। एक ओर खसरा 2379/1 की भूमि दिखाकर प्रस्ताव भेजा गया, वहीं दूसरी ओर वास्तविक निर्माण 2370/1 में शुरू कर दिया गया।

इस तरह की कार्यप्रणाली न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि कहीं न कहीं जानबूझकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न की गई है। इससे पूरे मामले में पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

जनता में बढ़ता आक्रोश और प्रशासन पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बाद स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। लोग इसे न केवल कानून की अवहेलना मान रहे हैं, बल्कि इसे शिक्षा, पर्यावरण और सार्वजनिक हितों के साथ खिलवाड़ भी बता रहे हैं।

लोगों का सीधा सवाल है कि जब हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दे दिया है, तो उसके बावजूद निर्माण कार्य कैसे जारी है? क्या संबंधित अधिकारी खुद को कानून से ऊपर समझ रहे हैं?

अवमानना की आहट — बढ़ सकती है कानूनी कार्रवाई

कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी निर्माण कार्य जारी रहता है, तो यह स्पष्ट रूप से Contempt of Court का मामला बनता है। ऐसी स्थिति में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो सकती है, जिसमें व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में पेशी, आर्थिक दंड और यहां तक कि कारावास भी शामिल है।

यह सिर्फ निर्माण नहीं, सिस्टम की परीक्षा है

पेंड्रा का यह मामला अब सिर्फ एक निर्माण परियोजना तक सीमित नहीं रहा। यह प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और कानून के सम्मान की परीक्षा बन गया है।

एक ओर अदालत का स्पष्ट आदेश है, दूसरी ओर जमीनी स्तर पर उसकी अनदेखी। एक ओर स्कूल और पर्यावरण की रक्षा की बात है, दूसरी ओर विकास के नाम पर विवादित निर्णय।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या न्यायालय के आदेशों का सम्मान सुनिश्चित किया जाता है या नहीं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *